🪐”हर वर्ष जून के तीसरे रविवार को पितृ दिवस मनाया जाता है। यह दिन उन अद्वितीय व्यक्तियों को समर्पित होता है, जो न केवल हमारे जन्मदाता हैं, बल्कि जीवन की कठिन राहों में हमारी ढाल, हमारी प्रेरणा और हमारे मार्गदर्शक भी होते हैं – हमारे पिता।
✍️ “पिता वह वृक्ष हैं- जिसकी छाया में पूरा परिवार फलता-फूलता है। जहाँ माँ ममता और कोमलता का प्रतीक होती है, वहीं पिता अनुशासन, कर्तव्य और जिम्मेदारी का पर्याय होते हैं। वे अक्सर अपने प्रेम को शब्दों में नहीं, बल्कि अपने कर्मों और त्याग से जताते हैं।
📒 “एक पिता के कंधे पर बैठकर बच्चा दुनिया को ऊँचा देखता है और जब वही बच्चा बड़ा होता है, तो पिता उसे ऊँचाई तक पहुँचाने के लिए अपनी सीमाएँ तक लाॅंघ जाता है। वह खुद तपता है, पर बच्चों के लिए छांव बन जाता है।
✅पिता की उंगली थाम जब चला,
हर डर से तब मैं बच चला।
वो मौन रहे, पर सदा डटे,
सपनों की खातिर, खुद ही घटे।
न छांव माँगी, न चैन लिया,
हर रात जलकर, सवेरा किया।
जो दिखे नहीं, पर साथ रहे,
छाया बन हर बार रहे।
उनकी डाँट में प्यार छुपा,
उनकी चुप्पी में संसार छुपा।
हे पिता! तुम जीवन सार,
तुम हो मेरी सबसे बड़ी उपहार। शिक्षक जे. पी. कुकरेती



